Yada Yada hi Dharmasya: यदा यदा ही धर्मस्य फुल श्लोक हिंदी अर्थ जाने

हेलो दोस्तों स्वागत है आप सभी का आज की हमारे इस नए पोस्ट में आज हम बात करने वाले है Yada Yada hi Dharmasya: यदा यदा ही धर्मस्य फुल श्लोक हिंदी अर्थ जाने, भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत में किया है, यह अध्याय 4 का आठवाँ श्लोक हैं, हम आपको इस श्लोक का हिंदी अर्थ बहुत ही सरल और आसान शब्द बताने जा रहे हैं |

Yada Yada Hi Dharmasya Sloka In Hindi: इस पोस्ट में आज हम गीता के सबसे अधिक सुनने वाले और प्रसिद्ध श्लोक के बारे में आपको विस्तार से बात करने वाले है। इसके साथ ही यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत (Yada Yada hi Dharmasya Sloka) श्लोक की विस्तार से व्याख्या भी करेंगे |

Yada Yada hi Dharmasya: यदा यदा ही धर्मस्य फुल श्लोक हिंदी अर्थ जाने

यह श्लोक हिन्दू ग्रंथ गीता का प्रमुख श्लोकों में से एक है। यह श्लोक गीता के अध्याय 4 का श्लोक 7 और 8 है। यह श्लोक का वर्णन महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने किया था जब अर्जुन ने कुरूक्षेत्र में युद्ध करने से मना कर दिया था।

यदा यदा ही धर्मस्य श्लोक का हिंदी अर्थ | Yada Yada Hi Dharmasya Sloka Meaning in Hindi

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

इस श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं, “जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ |
सज्जनों और साधुओं की रक्षा के लिए, दुर्जनो और पापियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में अवतार लेता हूँ”

शब्दार्थ

यदा- जब
हि- भी
धर्मस्य- धर्म की
ग्लानि: – हानि
भवति- होती है
भारत- अर्जुन, संसार
अभ्युत्थानम- वृद्धि
अधर्मस्य- अधर्म की
तदा – तब
आत्मानं – स्वयं को
सृजामि – प्रकट (सृजन) करता हूँ।
अहम – मैं

यदा यदा ही धर्मस्य श्लोक की विस्तृत व्याख्या (Yada Yada hi Dharmasya Hindi)

श्री कृष्ण ने अपने मुख से सभी श्लोक को बताया है, जो श्रीमद्भागवत गीता में कही गई है। इसी श्रीमद्भागवत गीता के चौथे अध्याय के सातवें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि-

जब जब संसार में पाप और अधर्म बढ़ने लगता है। लोग अन्याय एवं गलत कामों में लग जाते है और धर्म का विनाश होने लगता है, तब ईश्वर और धर्म (सद्कार्य) समाप्त होने लगता है। तब इस संसार में अधर्म को रोकने और धर्म की फिर से वृद्धि करने के लिए मैं पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।

जो इंसान पृथ्वी पर सज्जनों जैसा व्यवहार करता है, उन सभी व्यक्तियों की रक्षा के लिए और दुष्टों के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना करने के लिए मैं हर युग में अवतार लेता हूँ और जन कल्याण धर्म स्थापना करता हूँ।

भगवत गीता के आठवें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन से कहते हैं कि ऐसे समय में ईश्वर में विश्वास रखने वाले अच्छे कर्म करने वाले सज्जन पुरुषों की दुष्टों से रक्षा करता हूँ और पृथ्वी पर उपलब्ध पापियों, अधर्मियों और दुष्टों को मारने के लिए हर कालखंड में, हर युग में अवतार लेता हूं।

जब जब धर्म की हानि होगी, उसकी रक्षा करता हूँ और धर्म के प्रति लोगों के अविश्वास को दूर करता हूँ। अपने  उपदेशों के द्वारा लोगों में धर्म के प्रति विश्वास जाग्रत करके लोगों के हृदय और मन में धर्म के प्रति आस्था की स्थापना करता हूँ।

गीता के अन्य प्रमुख श्लोक

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥

भावार्थ- आत्मा अजर और अमर है। कोई भी शस्त्र उसे काट नहीं सकता है। आग  उसे जला नहीं सकती। न तो पानी आत्मा को गीला कर सकता है, न ही हवा उसे सुखा सकती है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

भावार्थ- हे अर्जुन! मानव के अधिकार में केवल कर्म करना ही है। कर्म का फल उसके अधिकार में नहीं है। इसलिए मनुष्य को को फल की आशा किए बिना केवल कर्म करना चाहिए। न ही कर्मफल में आसक्ति रखनी चाहिए।

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥

भावार्थ- यह धर्मयुद्ध है। यदि तुम इसमें वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। यदि विजयी होते हो तो राज्य का भोग करोगे। इसलिए हे कुंतीपुत्र उठो और दृढ़ निश्चय करके युद्ध करो।

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Conclusion / निष्कर्ष:-

आशा करता हु दोस्तों आपको ये पोस्ट जरूर पसंद आया होगा। और इस पोस्ट मे मेने Yada Yada hi Dharmasya: यदा यदा ही धर्मस्य फुल श्लोक हिंदी अर्थ जाने इसके बारे मे पूरी जानकारी दी हुई है।

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